मेरा पिण्ड मेरा खेत मेरा देश
26 नवम्बर 2020 से भारत का किसान देश की राजधानी दिल्ली की सीमा पर आंदोलन करता रहा। मुद्दा यह था कि केंद्र में भाजपा सरकार तीन नए क़ानून ले कर आयी। किसानों को लगा कि यह कानून उन के हित में नहीं। अत्यधिक सर्दी, गर्मी, बारिश और कोरोना जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी किसान हजारों की संख्या में सड़कों पर टेंट लगा कर या ट्रेक्टर ट्रालिओं में डटे रहे। बहुत से आंदोलनकारी दम तोड़ गए। सरकार ने किसान नेताओं के साथ 11 दौर तक बातचीत कर मसले का हल निकालने का प्रयास किया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी हस्तक्षेप किया है। परंतु आंदोलनकारी आंदोलन छोड़ने को तैयार नहीं हुए। आखिर 19 नवंबर 2021 को गुरु नानक देव के जन्म दिवस के अवसर पर देश के प्रधान मंत्री ने देश के नाम संबोधन में कहा कि यह कानून सरकार किसान के भले के लिए लेकर आई थी। परंतु शायद सरकार किसानों को समझा नहीं पाई। इसलिए यह कानून वापिस ले लिए जाएंगे और लोक सभा के आगामी सत्र में यह कानून वापिस ले लिए गए। किसानों ने आंदोलन समाप्ति की घोषणा कर दी और जशन मनाते हुए 12 दिसंबर 2021 को आपने आपने गांवों की तरफ रवाना हुऐ। आजाद भारत में यह दूसरी बार हुआ है कि किसी ताकतवर प्रधान मंत्री ने जनता के विरोध के कारण अपना यू टर्न लिया हो। सर्वप्रथम 1977 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल को वापिस लेकर चुनाव प्रतिक्रिया शुरू की जिस में वह बुरी तरह हार गई थी। दूसरा अब यह कृषि कानून की वापसी।
इस आंदोलन की शुरुआत की पंजाब के किसानों ने। बाद में हरियाणा, राजस्थान और पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसान भी शामिल हो गए। किसान नेताओं ने बड़ी खूबसूरती से आंदोलन को किसी राजनीतिक दल से जुड़ने नहीं दिया और गाँधी जी की तरह आंदोलन को अहिंसा की राह पर चलाया। अब समझ आ रहा है कि गांधी जी ने सत्याग्रह के लिए अहिंसा की राह क्यों थामी थी।
असल बात तो यह है की भारत में अधिकांश जनमानस लघु दर्जे पर काम करता है। देश का अधिकाँश किसान छोटी छोटी भूमि का मालिक है और मात्र 2 -5 एकड़ पर खेती करता है। यही भूमि पीढ़ी दर पीढ़ी उस के परिवार की रोज़ी रोटी का आधार रहा है। इतना सब कुछ लघु स्तर पर होने के बावजूद 2019 में भारत में 298 MT खाद्य सामग्री का उत्पादन हुआ जिस के कारण भारत का इस उत्पाद में विश्व में दूसरा स्थान है। दुनिया में दूध, गन्ना, गर्म मसाले, पटसन, मिल्लेट्स और कैस्टर का सर्वाधिक उत्पादन भारत में ही होता है। इस के अतिरिक्त भारत में बादाम, काजू आदि सूखे मेवे, दालें, मछली, अंडे और नारियल प्रचुर मात्रा में भारत के किसान ही उत्पादन करते हैं। किसान सरकार से पूछ रहा है की हम इतना सही दिशा में कार्य कर रहे हैं तो सरकार हमारे ऊपर इस तरह के कानून क्यों थोप रही है। सरकार कहती है कि खेती में सुधार की आवश्यकता है और अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा और किसान की आमदनी दोगुनी हो जाएगी। किसान नेता कहते हैं कि सरकार खेती का बाज़ारीकरण कर रही है, खेतों को चंद पूंजीपति हड़प लेंगे और अधिकाँश लोग बेरोज़गार हो जाएं गे। किसान को अपनी भूमि छोड़ मज़दूर बन कर निर्वाह करना पड़ेगा।”
किसान का जीवन और आत्मसम्मान अपनी भूमि और खेती से जुड़ा रहता है और वह किसी भी हालत में अपनी भूमि से वंचित नहीं होना चाहता। देश की 90% जनसँख्या गाँव या छोटे शहरों में किसान की खेती या खेती आधारित व्यवसाय पर निर्भर है। किसान खेती करता है। उसी पर निर्भर हैं गाँव के भूमि रहित मज़दूर और गाँव के लघु और कुटीर उद्योग। लघु व्यवसाय भी उसी किसान पर निर्धारित हैं। कुछ उद्योग और व्यवसाय तो उसे किसानी के लिए लिए बीज, खाद, दवाइयां, मशीन और उपकरण उपलब्ध करवाते है और कुछ खेती की उपज की खरीद करते हैं और खेती आधारित उद्योग भी इसी पर निर्भर हैं। कुछ चीज़ों के लिए किसान और ग्रामीण जनता को बाजार पर निर्भर रहना पड़ता है जो नज़दीक की मंडी में उपलब्ध रहती हैं। मंडी में आढ़तिया किसान को उस की फसल बिकवाने में मदद करता है और गाहे बगाहे उस को क़र्ज़ भी देता है। इस तरह से देखा जाए तो एक मंडी और उस के आस पास के गाँव मिल कर एक पूर्ण अर्थव्यवस्था बन जाती है।
अब यह समाज शास्त्रियों का विषय है कि समाज किस तरफ अग्रसर हो रहा है। देश में परिवार तो पहले से ही टूट रहे हैं। नौकरी के लिए घर से बाहर या विदेश जाना पड़ता है। गली मुहल्ले में बजुर्ग माता पिता बच्चों की राह देखते रहते हैं। खेती ही एक ऐसा पेशा है जिस में लोग जमीन के साथ जुड़े रहते हैं और परिवार बना कर रहते हैं। वैसे तो किसान के बच्चे भी खेती नहीं करना चाहते और विदेश की और भागते हैं। परंतु इस किसान आंदोलन ने साबित कर दिया कि किसान जमीन के साथ जुड़ा रहना चाहता है।
सतीश कालड़ा
बैंगलोर
13.12.2021